माफिया का महिमामंडन तक क्यों करते हैं राजनीतिक दल?

डॉ. आशीष वशिष्ठ
उत्तर प्रदेश विधानसभा में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की हुंकार प्रदेश और देशवासियों को विस्मृत नहीं हुई है। जब उन्होंने कहा था कि माफिया को मिट्टी में मिला देंगे। जान के लाले पड़ जाएंगे। माफिया या तो जेल में होगा अथवा उत्तर प्रदेश से भाग जाएगा। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का यह बयान प्रयागराज में बसपा विधायक राजू पाल हत्याकाण्ड के चश्मदीद उमेश पाल की दिनदिहाड़े हत्या के बाद आया था। उमेश पाल की नृंशस हत्या अतीक अहमद के बेटे और गुर्गो ने की थी। उमेश पाल की हत्या के बाद अतीक अहमद के परिवार और गुर्गों के सितारे गर्दिश में चल रहे हैं। हत्याकाण्ड में शामिल कई शूटरों का पुलिस इनकाउंटर कर चुकी है। जिसमें अतीक का बेटा असद भी शामिल है। बीती 15 अप्रैल को पुलिस के सख्त पहरे और चैतरफा घेरेबंदी के बावजूद, किसी ने मीडिया का मुखौटा धारण कर, अतीक और उसके छोटे भाई अशरफ पर गोलियां चला दीं और कुछ ही सेकंड में जिंदगियां निष्प्राण हो गईं। माफिया के रूपक बने दोनों भाई मारे गए।
यह हत्यावादी हमला भी किसी साजिशाना रणनीति का हिस्सा हो सकता है! अतीक और अशरफ को ‘लाश’ बनाने वालों ने आत्म-समर्पण भी कर दिया। उन पर हत्या का मुकदमा चल सकता है। साक्ष्य बिल्कुल स्पष्ट और सार्वजनिक हैं। उप्र के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने न्यायिक आयोग से जांच के आदेश दिए हैं। बेशक अतीक की माफियागीरी का फिलहाल अंत को चुका है, लेकिन उसके चार बेटे (दो बालिग, दो नाबालिग) पुलिस की गिरफ्त में हैं।
लेकिन जिस तरह की राजनीति अतीक और अशरफ की हत्या के बाद की जा रही है, वो सोचने को मजबूर करती है। अतीक और अशरफ की मौत को चंद सियासी दल और संगठन सांप्रदायिक मुद्दा बनाने की कोशिश लगातार कर रहे हैं। सपा, बसपा और ओवैसी इस हत्याकांड को ‘मुस्लिमवाद’ के तौर पर प्रचारित करने में प्रयासरत हैं। यह खुला तथ्य है कि अतीक को मुलायम सिंह यादव और मायावती सरीखे नेताओं का संरक्षण हासिल था, जिसकी छाया में वह माफिया बनता चला गया। अतीक की पत्नी शाइस्ता परवीन उमेश पाल शूटआउट केस में नामजद अभियुक्त हैं। उमेश पाल शूटआउट केस में संलिप्तता सामने आने के बाद पुलिस ने 50 हजार का इनाम घोषित किया है।
फिलवक्त फरार चल रही शाइस्ता ने इस साल जनवरी की पांच तारीख का असदुद्दीन की पार्टी एआईएमआईएम को छोड़कर बसपा का दामन थामा था। शाइस्ता के साथ उनके तीन बेटों ने भी बसपा की सदस्यता ली थी। उस वक्त यूपी निकाय चुनाव टलने की वजह से आज अतीक अहमद की पत्नी शाइस्ता को आधिकारिक तौर पर प्रयागराज सीट से मेयर का उम्मीदवार घोषित नहीं किया गया था। इसके बावजूद मंच से कई बार यह बात कही गई कि जब भी चुनाव होगा और शाइस्ता परवीन टिकट चाहेंगी तो पार्टी उन्हें ही उम्मीदवार बनाएगी। आज अगर उमेश पाल हत्याकाण्ड न हुआ होता तो, शाइस्ता परवीन अपने गुर्गों के साथ प्रयागराज में घर-घर जाकर अपने लिए वोट मांग रही होती। और हो सकता है वो माननीय मेयर भी बन जाती।
अतीक की हत्या के बाद जिस तरह की राजनीति चंद सियासी दल कर रहे हैं। और जिस तरह की रिपोर्ट कुछ पत्रकार और मीडिया हाउस कर रहे हैं, वो साफ तौर पर दर्शाता है कि अपराधी नेता और मीडिया की दोस्ती कितनी गहरी है। माफिया अतीक अहमद कई राजनीतिक दलों और नेताओं के ‘अतीक जी’ हैं। बिहार के उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव का मानना है कि जनाजा ‘अतीक जी’ का नहीं, कानून का निकला है। बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने अतीक-अशरफ पर जानलेवा हमले को ‘भारत के संविधान पर हमला’ करार दिया है। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव, बसपा प्रमुख मायावती और ओवैसी सरीखे नेताओं की फेहरिस्त लंबी है, जो अतीक-अशरफ की हत्या को ‘लोकतंत्र की हत्या’ मान रहे हैं। यह सबसे विरोधाभासी उपमा है। अतीक कब लोकतंत्रवादी था? जरा इस सवाल की व्याख्या वे नेतागण कर दें, जो आज रुदाली-प्रलाप में डूबे हैं।
अतीक मुलायम सिंह यादव और मायावती के करीब और संरक्षण में रहा है, लिहाजा सपा-बसपा के नेताओं ने मुठभेड़ और कानून-व्यवस्था पर सवाल उठाए हैं। चूंकि ओवैसी ‘मुस्लिमवादी’ सियासत करते हैं, लिहाजा वह चिंघाड़ रहे हैं कि पुलिस ही मुठभेड़ में मारती रहेगी, तो अदालतें और जज क्या करेंगे? अदालतों पर ताले लटका देने चाहिए। किसी भी अपराध की सजा सरकार और पुलिस नहीं, न्यायपालिका तय करती है। अतीक के जरिए ही राजनीति का अपराधीकरण भी खूब बढ़ा, क्योंकि उप्र में सपा सरकार ने 2 बार, कांग्रेस सरकार ने एक बार और भाजपा गठबंधन की सरकार ने भी एक बार, अतीक के खिलाफ, ‘गैंगस्टर एक्ट’ वापस लिया था। कानून का मजाक उड़ाया गया। दुहाई यह दी जा रही है कि किसी भी अपराधी और माफिया को सजा देने का दायित्व और अधिकार अदालत और कानून-संविधान का है। कमोबेश हमारी सोच भी यही है कि देश कानून-संविधान से ही चलना चाहिए। हम मुठभेड़ी हत्याओं और सरेआम लाशें बिछा देने की करतूतों के खिलाफ हैं, लेकिन ऐसा हरेक सरकार में होता रहा है। विपक्ष में आते ही विस्मृति छाने लगती है।
गौरतलब यह है कि किसी निचली अदालत के नहीं, बल्कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय के 10 न्यायाधीश इतने खौफजदा थे कि उन्होंने अतीक से जुड़े आपराधिक मामलों की सुनवाई से ही इंकार कर दिया था। उन न्यायाधीशों के नाम आज सार्वजनिक हो चुके हैं। संदर्भ 2010 और उसके बाद के हैं। उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश ने अतीक के केस जिस भी न्यायमूर्ति को सुनने के लिए दिए, उसी ने हाथ खड़े कर दिए। सुनवाई से अलग ही रहे। किसी अन्य न्यायाधीश को रेफर करने का आग्रह किया।
नतीजतन अतीक के खिलाफ करीब 44 सालों तक कोई भी अदालती फैसला नहीं आ सका। कानून अप्रासंगिक बनकर रह गया। अतीक अपराध करता रहा। माफिया भी बन गया। हत्याओं के केस लगातार दर्ज होते रहे। जमीनों पर कब्जे किए जाते रहे। फिरौतियां वसूली गईं। वह जेल तो गया, लेकिन किसी भी कानून ने उसे सजा नहीं सुनाई। ये तथ्य भी सामने आए हैं कि अतीक के तार पाकिस्तान और उसकी खुफिया एजेंसी आईएसआई से जुड़े थे। उसके लश्कर-ए-तैयबा सरीखे आतंकी संगठन से भी नापाक जुड़ाव थे। अतीक ने पाकिस्तान और हमारे पंजाब के रास्ते विदेशी हथियार और फंडिंग आदि प्राप्त किए थे। क्या यह माफिया भारत-विरोधी भी रहा है?
अतीक के खिलाफ 100 से अधिक आपराधिक केस बताए जा रहे हैं। करीब दर्जन भर राज्यों में अतीक की ठेकेदारी भी माफियागीरी की तर्ज पर चलती रही। उसने अपराध और कारोबार से करोड़ों रुपए अर्जित किए। अतीक ने माफियागीरी से करीब 11,000 करोड़ रुपए की संपदा बनाई। मौजूदा उप्र सरकार और पुलिस का दावा है कि उसने अतीक गैंग की 1169.20 करोड़ रुपए मूल्य की संपत्तियों का जब्तीकरण और ध्वस्तीकरण किया है। किसी कानून और जांच एजेंसी ने आकलन करने की हिम्मत की थी कि माफिया अतीक के पास इतनी संपदा कहां से और कैसे आई?
कानून तो मानो अतीक का बंधक बना था। नेतागण आज किस कानून की दुहाई दे रहे हैं? ऐसी स्थितियों और समीकरणों में कानून और अदालतें क्या कर सकती थीं? उप्र में बीते छह साल से भाजपा की योगी सरकार है, लिहाजा आंकड़े गिनाए जा रहे हैं कि इस दौरान कितनी मुठभेड़ें की गईं और उन्हें कोई भी इंसाफ नहीं मिला। हम भी इसी सोच के पक्षधर हैं कि अंतिम न्यायवादी निर्णय अदालत का ही होना चाहिए, लेकिन अतीक जैसे माफिया को अदालतें सजा ही नहीं सुना पा रही हैं, तो सरकार और पुलिस क्या करे? क्या माफियागीरी को जिंदा रहने दें, फलने-फूलने दें? इस पहलू पर भी विचार किया जाना चाहिए। माफिया का महिमामंडन और उसे बेचारा साबित करने की बजाय राजनीतिक दल आम आदमी से जुड़े तमाम मुद्दों की ओर ध्यान देंगे तो लोक और तंत्र दोनों का उससे कल्याण होगा।